कितनी हसरत थी हमें…..

कितनी हसरत थी हमें,
अपनी बेटी को गोद में खिलाने की।
ईश्वर ने दिया वो वरदान,
मेरे घर आया फिर से किशन कन्हैया जैसा नन्हा शैतान।

देवी लक्ष्मी तो न आईं मेरे आँगन में,
पर आए नारायण लेकर कृष्ण का रूप।
खुशकिस्मत हैं वो जिनके घर होता है बेटी का आगमन,
मेरी ईच्छा अधूरी रह गई और बेटी के अभाव में सूना रह गया मेरा घर-आँगन।

बेटी को बचाओ और न करो कन्या भ्रूण हत्या।
खुशी मनाओ कि मिली है या मिलने वाली है तुम्हे बेटी,
क्योंकि बेटी के रोम-रोम में बसा होता है अपने माता-पिता के लिए प्यार।
इसलिए मत करो बेटी रूपी वरदान का बहिष्कार और तिरस्कार।

कन्या को भी दो जीने का अधिकार,
करो उसकी भी ईच्छाएँ पूरी और समाज में दो उसे भी सम्मान।
लड़की को भी दो बराबरी का दर्जा, रूढ़िवादी का चश्मा उतार।
बेटी भी बन सकती है तुम्हारे बुढापे का सहारा बन कर श्रवण कुमार।

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